हरियाणा में शिक्षकों के तबादलों का मामला अब महज़ प्रशासनिक प्रक्रिया न रहकर एक जटिल कानूनी दांव-पेंच बन गया है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से 12 मार्च को जो ताज़ा आदेश निकलकर आया है, उसने इस पूरी 'ट्रांसफर ड्राइव' की नींव हिला दी है। अदालत के इस आदेश ने एक साथ कई याचिकाओं को नत्थी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान में सरकार की पूरी 'स्थानांतरण नीति' (Transfer Policy ) ही न्यायपालिका की सूक्ष्मबीन के नीचे है।
इस आदेश का सबसे गहरा असर उन शिक्षकों पर पड़ेगा जो अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर नए स्टेशनों की राह देख रहे हैं। न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने साफ लफ़्ज़ों में कहा है कि चूंकि विभाग की नीति को ही चुनौती दी गई है, इसलिए कैडर आवंटन या स्टेशनों का बँटवारा जो भी हो, वह स्थायी नहीं माना जाएगा। कानूनी शब्दावली में कहें तो अब होने वाला हर तबादला 'कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन' है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कल को अदालत इस नीति में कोई खामी पाती है या इसे रद्द करती है, तो विभाग द्वारा किए गए सभी आदेश ताश के पत्तों की तरह ढह सकते हैं।
हैरानी की बात यह है कि अदालत ने प्रक्रिया पर पूर्ण विराम (Stay) नहीं लगाया है, लेकिन सरकार के उत्साह पर 'अस्थायी लगाम' ज़रूर कस दी है। यह वैसी ही स्थिति है जैसे किसी मुसाफिर को चलने की इजाजत तो दे दी जाए, लेकिन साथ में यह चेतावनी भी दी जाए कि मंज़िल पर पहुँचने के बाद भी उसे वापस लौटना पड़ सकता है। सरकार के लिए अब यह चुनौती है कि वह 16 मार्च की अगली सुनवाई में अदालत को इस नीति की तार्किकता और पारदर्शिता पर कैसे संतुष्ट करती है।
फिलहाल, शिक्षक समुदाय के लिए यह स्थिति किसी अनिश्चितता से कम नहीं है। एक तरफ विभाग की कार्यप्रणाली है और दूसरी तरफ अदालत की सख्ती। सोमवार की सुनवाई यह तय करेगी कि तबादलों की यह गाड़ी अपनी मंज़िल तक पहुँचेगी या फिर नियमों की मरम्मत के लिए इसे वापस वर्कशॉप (विभाग) में भेजा जाएगा। तब तक, हर आदेश और हर लिस्ट पर 'सशर्त' की मुहर लगी रहेगी।
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