नौवीं से बारहवीं कक्षाओं की परीक्षा में सेमेस्टर सिस्टम खत्म करके शिक्षा विभाग ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि सरकार शिक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाना चाहती है। हरियाणा शिक्षा बोर्ड के दसवीं और बारहवीं कक्षा के बदतर परीक्षा परिणामों से हर तरफ चिंता, निराशा व्याप्त है। स्थिति को सुखद बनाने के लिए इसके लिए बड़े पैमाने पर उपायों,सुधारों की जरूरत है। संभवत: विभाग ने सेमेस्टर सिस्टम खत्म करने का निर्णय भी इसी उद्देश्य से लिया पर गंभीर चिंतन का विषय यह है कि क्या एक और प्रयोग से शिक्षा क्षेत्र का रूप बदला जाना संभव है? हरियाणा में शिक्षा क्षेत्र प्रयोगशाला का रूप ले चुका है। पहले आठवीं को शिक्षा बोर्ड से मुक्त करने, फिर शिक्षा का अधिकार कानून और नियम 134 ए लागू करने, उसके बाद सेमेस्टर सिस्टम अमल में लाते समय यह मंथन नहीं किया गया कि इन उपायों, प्रयोगों से शिक्षा क्षेत्र का कायाकल्प होगा या दुश्वारियां बढ़ेंगी? बिंदु दर बिंदु पड़ताल की जाए तो सरकार और शिक्षा विभाग हर प्रयोग की विफलता को स्वीकार करते हुए कटघरे में खड़े नजर आएंगे। मुख्यमंत्री से लेकर शिक्षा मंत्री सार्वजनिक आयोजनों में कह रहे हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून से शिक्षा आधार खोखला हो गया है, आठवीं तक परीक्षा न करवाने का प्रावधान बदला जाएगा। आठवीं कक्षा की परीक्षा को फिर शिक्षा बोर्ड के तहत करने की तैयारी पूरी कर ली गई है, संभवत: अगले शिक्षा सत्र से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी। नियम 134 ए पर सरकार की ढुलमुल नीति कोर्ट के अंदर और बाहर स्पष्ट हो चुकी, हजारों गरीब बच्चों का एक और शिक्षा सत्र बेकार जाने की आशंका बन गई है। अब रही बात सेमेस्टर सिस्टम की, सरकार को जांच करनी चाहिए कि इसे लागू करते वक्त जो उद्देश्य तय किए गए थे, उनके पूरे न होने के लिए कौन जिम्मेदार हैं? चूंकि सरकार सेमेस्टर सिस्टम पर यू टर्न लेना चाहती है, इसका सीधा अर्थ है कि वह इसकी विफलता को स्वीकार कर चुकी। क्या गारंटी है कि परीक्षा पद्धति को वार्षिक बनाने से परिणाम बेहतर होंगे और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा? क्या यह माना जाए कि पिछली गलतियों से शिक्षा विभाग ने सबक लिया है और अब नई व्यवस्था में खामी नहीं आने दी जाएगी? सरकार को विशुद्ध रूप से तार्किक, व्यावहारिक उपायों पर गंभीर चिंतन-मनन करना होगा तभी परिणाम बेहतर बनाए जा सकते हैं, शिक्षा का अपेक्षित स्तर प्राप्त करना संभव है। प्रयोगों का सिलसिला तत्काल बंद होना चाहिए।
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Wednesday, June 3, 2015
एक और प्रयोग
नौवीं से बारहवीं कक्षाओं की परीक्षा में सेमेस्टर सिस्टम खत्म करके शिक्षा विभाग ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि सरकार शिक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाना चाहती है। हरियाणा शिक्षा बोर्ड के दसवीं और बारहवीं कक्षा के बदतर परीक्षा परिणामों से हर तरफ चिंता, निराशा व्याप्त है। स्थिति को सुखद बनाने के लिए इसके लिए बड़े पैमाने पर उपायों,सुधारों की जरूरत है। संभवत: विभाग ने सेमेस्टर सिस्टम खत्म करने का निर्णय भी इसी उद्देश्य से लिया पर गंभीर चिंतन का विषय यह है कि क्या एक और प्रयोग से शिक्षा क्षेत्र का रूप बदला जाना संभव है? हरियाणा में शिक्षा क्षेत्र प्रयोगशाला का रूप ले चुका है। पहले आठवीं को शिक्षा बोर्ड से मुक्त करने, फिर शिक्षा का अधिकार कानून और नियम 134 ए लागू करने, उसके बाद सेमेस्टर सिस्टम अमल में लाते समय यह मंथन नहीं किया गया कि इन उपायों, प्रयोगों से शिक्षा क्षेत्र का कायाकल्प होगा या दुश्वारियां बढ़ेंगी? बिंदु दर बिंदु पड़ताल की जाए तो सरकार और शिक्षा विभाग हर प्रयोग की विफलता को स्वीकार करते हुए कटघरे में खड़े नजर आएंगे। मुख्यमंत्री से लेकर शिक्षा मंत्री सार्वजनिक आयोजनों में कह रहे हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून से शिक्षा आधार खोखला हो गया है, आठवीं तक परीक्षा न करवाने का प्रावधान बदला जाएगा। आठवीं कक्षा की परीक्षा को फिर शिक्षा बोर्ड के तहत करने की तैयारी पूरी कर ली गई है, संभवत: अगले शिक्षा सत्र से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी। नियम 134 ए पर सरकार की ढुलमुल नीति कोर्ट के अंदर और बाहर स्पष्ट हो चुकी, हजारों गरीब बच्चों का एक और शिक्षा सत्र बेकार जाने की आशंका बन गई है। अब रही बात सेमेस्टर सिस्टम की, सरकार को जांच करनी चाहिए कि इसे लागू करते वक्त जो उद्देश्य तय किए गए थे, उनके पूरे न होने के लिए कौन जिम्मेदार हैं? चूंकि सरकार सेमेस्टर सिस्टम पर यू टर्न लेना चाहती है, इसका सीधा अर्थ है कि वह इसकी विफलता को स्वीकार कर चुकी। क्या गारंटी है कि परीक्षा पद्धति को वार्षिक बनाने से परिणाम बेहतर होंगे और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा? क्या यह माना जाए कि पिछली गलतियों से शिक्षा विभाग ने सबक लिया है और अब नई व्यवस्था में खामी नहीं आने दी जाएगी? सरकार को विशुद्ध रूप से तार्किक, व्यावहारिक उपायों पर गंभीर चिंतन-मनन करना होगा तभी परिणाम बेहतर बनाए जा सकते हैं, शिक्षा का अपेक्षित स्तर प्राप्त करना संभव है। प्रयोगों का सिलसिला तत्काल बंद होना चाहिए।
Sunday, May 31, 2015
टूटती उम्मीदों के बीच गेस्ट टीचरों को एक माह की राहत
एक माह की राहत
टूटती उम्मीदों के बीच गेस्ट टीचरों को एक माह की और मोहलत मिल गई और साथ ही सरकार को अपना प्रबंध कौशल साबित करने के लिए अतिरिक्त अवधि भी। सरप्लस टीचरों के बारे में स्टेटस रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश करने में लगातार गफलत की स्थिति बनी रही, यह परिस्थितिजन्य थी या नियोजित, इस पर ध्यान देने से जरूरी बात यह है कि अब सरप्लस को अनिवार्य कैसे साबित किया जाएगा? स्टेटस रिपोर्ट के नाम पर तय तिथि को कोर्ट की कार्यवाही के अंतिम क्षणों में एडवोकेट जनरल ने सूचना दी कि 28 गेस्ट टीचरों की सेवाएं1 जून से समाप्त कर दी जाएंगी, शेष साढ़े तीन हजार के बारे में निर्णय के लिए समय मांग लिया गया। घटनाक्रम और सक्रियता से गेस्ट टीचरों के बारे में सरकार की नीति और नीयत का आभास तो होने लगा है। स्टेटस रिपोर्ट पेश करने की तिथि निकट आते ही सात हजार टीजीटी को पीजीटी के पद पर प्रमोट करने के लिए शिक्षा विभाग ने आवेदन मांग लिए। शिक्षा मंत्री कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके कि टीजीटी को पदोन्नत कर पद रिक्त किए जाएंगे, उन पर अतिथि अध्यापकों को एडजस्ट किया जाएगा। मंत्री समूह की बैठक में भी ऐसा ही आश्वासन दिया गया था। बड़ी संख्या में गेस्ट लेक्चरर भी वर्षो से कार्यरत हैं, यदि शिक्षा विभाग ने
टूटती उम्मीदों के बीच गेस्ट टीचरों को एक माह की और मोहलत मिल गई और साथ ही सरकार को अपना प्रबंध कौशल साबित करने के लिए अतिरिक्त अवधि भी। सरप्लस टीचरों के बारे में स्टेटस रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश करने में लगातार गफलत की स्थिति बनी रही, यह परिस्थितिजन्य थी या नियोजित, इस पर ध्यान देने से जरूरी बात यह है कि अब सरप्लस को अनिवार्य कैसे साबित किया जाएगा? स्टेटस रिपोर्ट के नाम पर तय तिथि को कोर्ट की कार्यवाही के अंतिम क्षणों में एडवोकेट जनरल ने सूचना दी कि 28 गेस्ट टीचरों की सेवाएं1 जून से समाप्त कर दी जाएंगी, शेष साढ़े तीन हजार के बारे में निर्णय के लिए समय मांग लिया गया। घटनाक्रम और सक्रियता से गेस्ट टीचरों के बारे में सरकार की नीति और नीयत का आभास तो होने लगा है। स्टेटस रिपोर्ट पेश करने की तिथि निकट आते ही सात हजार टीजीटी को पीजीटी के पद पर प्रमोट करने के लिए शिक्षा विभाग ने आवेदन मांग लिए। शिक्षा मंत्री कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके कि टीजीटी को पदोन्नत कर पद रिक्त किए जाएंगे, उन पर अतिथि अध्यापकों को एडजस्ट किया जाएगा। मंत्री समूह की बैठक में भी ऐसा ही आश्वासन दिया गया था। बड़ी संख्या में गेस्ट लेक्चरर भी वर्षो से कार्यरत हैं, यदि शिक्षा विभाग ने
Tuesday, March 31, 2015
जख्म न बने नासूर:EDITORIAL BY DAINIK JAGRAN
पहले गेस्ट और फिर पात्र अध्यापकों का सीएम सिटी करनाल में डेरा डालना साबित करता है कि शिक्षा क्षेत्र में नियम, प्रक्रिया और मंशा को स्पष्ट, व्यावहारिक और पारदर्शी बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। बार-बार के आश्वासनों से खिन्न साढ़े नौ हजार से अधिक नव चयनित जेबीटी अध्यापकों ने करनाल में महापंचायत करके दर्शा दिया है कि या तो सरकार उनकी दुविधा, अनिश्चय का अंत करे या फिर आरपार की लड़ाई का सामना करने को तैयार रहे। प्रदेश में जेबीटी अध्यापक की स्थिति बिना राज्य के मुख्यमंत्री, बिना देश के राष्ट्रपति और बिना धन के कुबेर जैसी है। सरकारी मानकों के अनुसार उनका चयन तो हो गया लेकिन नियुक्ति पत्र नहीं मिला यानी वे अध्यापक नियुक्त तो हो गए पर न ड़्यूटी पर हैं और जब ड्यूटी ही नहीं तो वेतन कैसा? उनके साथ दो स्तरों पर सौतेला व्यवहार किया गया। न तो सरकार ने 30 मार्च, 2012 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए उन्हें 322 दिनों में नौकरी दी और पिछले वर्ष जैसे-तैसे नियुक्ति के लिए पात्र माना तो चयन सूची जारी होने के आठ माह बाद भी नियुक्ति पत्र नहीं दे रही। 1 तकनीकी जांच की
Thursday, July 18, 2013
HTET RESULT PAR GAHAN CHINTAN ZARURI
हरियाणा शिक्षक पात्रता परीक्षा के परिणाम को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कई पहलुओं पर गंभीर चिंतन जरूरी है। एचटेट पद्धति लागू होने के बाद का यह सबसे खराब परिणाम है, चिंतनीय तथ्य यह भी है कि हर परीक्षा में रुझान गिरावट का ही रहा। अहम सवाल है कि प्रतिस्पर्धा के दौर में भावी शिक्षक अपने को मुकाबले के लिए तैयार क्यों नहीं कर पा रहे? तीनों वर्गो में कुल मिला कर केवल साढ़े चार फीसद भावी शिक्षक उत्तीर्ण हो पाए। स्पष्ट है कि जेबीटी, बीएड तथा स्नातकोत्तर परीक्षा पास करने के बाद भी भावी शिक्षकों को वह काउंसिलिंग नहीं मिल पा रही जो उन्हें व्यावसायिक प्लेटफार्म पर स्थापित कर सके। स्कूल से लेकर
Friday, May 31, 2013
उपलब्धता का संकट:EDITORIAL OF DAINIK JAGRAN DATED 31.05.13
सर्वशिक्षा अभियान के तहत स्कूलों में पहली से आठवीं तक के बच्चों को स्तरीय व रंगीन पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध करवाने का शिक्षा विभाग का निर्णय बच्चों को निश्चित तौर पर रुचिकर लगेगा। प्रिंटिंग की गुणवत्ता के साथ कंटेंट का उच्च स्तर कायम रखने की विशेष जिम्मेदारी तो विभाग पर रहेगी ही, शिक्षा बोर्ड को भी मानकों पर खरा उतरना होगा। सर्वशिक्षा अभियान सरकार की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी योजना है। जिस लक्ष्य को सामने रख कर इसकी कल्पना की गई थी उसे पूरा होने में अभी काफी समय लगने
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