हरियाणा की शिक्षक स्थानांतरण नीति के गलियारों से एक बड़ी और सनसनीखेज खबर छनकर आ रही है। सूत्रों के अनुसार, कल माननीय उच्च न्यायालय के भीतर का माहौल काफी गर्माया हुआ रहा, जहाँ सरकार की मौजूदा ट्रांसफर पॉलिसी सीधे तौर पर न्याय के तराजू पर तौल दी गई। कोर्ट रूम के भीतर चली लंबी बहस के बाद जो जानकारी सामने आई है, वह उन हजारों शिक्षकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है जो इस नीति के भरोसे बैठे थे माननीय जज साहब ने आज सरकार के पैरोकारों (AAG) की दलीलों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए पॉलिसी की बुनियादी खामियों पर कड़े प्रहार किए।
सूत्रों का कहना है कि न्यायालय ने विशेष रूप से विकलांगों और कपल केस के बीच अंकों की असमानता को लेकर अपनी गहरी नाराजगी जताई है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली और तार्किक टिप्पणी पुरुषों के अधिकारों को लेकर आई, जहाँ कोर्ट ने सीधा सवाल दागा कि क्या इस पूरी व्यवस्था में जेंट्स (पुरुषों) का कोई वजूद या अधिकार नहीं है? केवल एक पक्ष को वरीयता देने की नीति पर अदालत कतई संतुष्ट नहीं दिखी और यहाँ तक चेतावनी दे डाली कि यदि इस भेदभावपूर्ण नीति में सुधार नहीं किया गया, तो अगली सुनवाई पर पूरी पॉलिसी को 'क्रैश' यानी जड़ से खत्म करने के आदेश पारित कर दिए जाएंगे।
अदालत के इस कड़े रुख को देखते हुए सरकारी वकीलों ने स्थिति को संभालने की बहुत कोशिश की, लेकिन अनुभवी वकीलों की भारी-भरकम दलीलों के आगे उनकी एक न चली। आखिरकार सरकार ने इस मामले में गहराई से विचार करने के लिए 31 मार्च तक का समय मांगा है, जिसके चलते अब अगली सुनवाई 1 अप्रैल को तय की गई है। तब तक के लिए पूरी स्थानांतरण प्रक्रिया को 'होल्ड' पर डाल दिया गया है। गुप्त सूत्रों की मानें तो यह 1 अप्रैल की तारीख हरियाणा के शिक्षा विभाग और नीति निर्धारकों के लिए अग्निपरीक्षा साबित होने वाली है। अब सभी को आधिकारिक कोर्ट ऑर्डर का इंतज़ार है ताकि इस कानूनी दांव-पेच की परतें और भी साफ हो सकें।
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